Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 27, Verse 40
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 27, verse 40 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 27 · श्लोक 40
संस्कृत श्लोक
धातुर्नवानि दिवसं प्रति भीषणानि रम्याणि वा विलुलितान्ततमाकुलानि ।
कार्याणि कष्टफलपाकहतोदयानि विस्मापयन्ति न शवस्य मनांसि केषाम् ॥ ४० ॥
हिन्दी अर्थ
लोगों की दुर्गति को देखकर दुःखित हुए श्रीरामचन्द्रजी लोगों की दुरति मे कारणभूत देव की निंदा
करते हैं।
महर्षे यह दैव अचेतन होने के कारण मृतक-समान है। यदि यह जीवित होता तो ऐसा निर्दय न
होता। यह (देव) इस संसार में प्रतिदिन फल से भीषण (भीषण क्लेश देनेवाले) आपाततः (विचार के
बिना) भले प्रतीत होनेवाले राग आदि से अत्यन्त व्याकुल चित्तवाले लोगों से पूर्ण एवं अन्त में कष्टरूपी
फल देने के कारण जिनका उदय दूषित है, ऐसे नूतन-नूतन कार्य करता है । उसके ये कार्य किन
विवेकशील पुरुषों के मन को आश्चर्यचकित नहीं करते