Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 27, Verse 23
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 27, verse 23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 27 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
अजस्रमागच्छति सत्वरैवमनारतं गच्छति सत्वरैव ।
कुतोऽपि लोला जनता जगत्यां तरङ्गमाला क्षणभङ्गुरेव ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
भगवती श्रुति ने भी कहा है - असनन्नेव स भवति असद् ब्रह्मेति वेद चेत्” अर्थात् जो असत् देह
आदि को ब्रह्म समझता है वह असत् ही हो जाता है। श्लोक में 'जनैडका: ' पद है अर्थात् जनरूपी एडक
(भेड़) किसी किसी यज्ञ में भेड़ों का बलिदान प्रसिद्ध है अथवा एडक शब्द की बकरे में लक्षणाकर
नररूपी बकरा अर्थ कर लेना चाहिए ( ८3 )।
< भाव यह कि जैसे यजमान यज्ञकार्य की सिद्धि के लिए यज्ञस्तम्भ में बधे हुए बकरे आदि का
संस्कार करता है, तदुपरान्त ऋत्विक् उसका यथाविधि हनन और उसके अंग-प्रत्यांगों का छेदन करते
हैं, वैसे ही परम प्रिय प्राण भी विषयभोग और देहपोषण आदि द्वारा अति परिपुष्ट लोगों को निन्दित कर्मो
इस संसार में यह चंचल जनता क्षण में नष्ट होनेवाली तरंगों की पंक्ति के समान न मालूम कहाँ से
सदा बड़ी त्वरा के साथ आती है ओर जैसे आती है वैसे ही त्वरा के साथ न मालूम सदा कहाँ चली जाती
हे । कुतोऽपि" इस कथन से जहाँ से आती है ओर जहाँ चली जाती है, उस स्थान को हम जानना चाहते
हैं, यह सूचित होता है