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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 27, Verses 37–38

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 27, verses 37–38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 27 · श्लोक 37,38

संस्कृत श्लोक

आदातुमिच्छन्पदमुत्तमानां स्वचेतसैवापहतोऽद्य लोकः । पतत्यशङ्कं पशुरद्रिकूटादानीलवल्लीफलवाञ्छयैव ॥ ३७ ॥ अवान्तरन्यस्तनिरर्थकांशच्छायालतापत्रफलप्रसूनाः । शरीर एव क्षतसंपदश्च श्वभ्रद्रुमा अद्यतना नराश्च ॥ ३८ ॥

हिन्दी अर्थ

आसक्ति होने पर केवल पुरुषार्थ की हानि ही नहीं होती, प्रत्युत महान्‌ अनर्थ भी होता है, ऐसा कहते है। जैसे पशु हरी-हरी लतारूप फल की प्राप्ति की इच्छा से ही पर्वतशिखर से गिर पडता है, वैसे ही उत्कृष्टभोगशाली पुरुषों का पद (समता या राज्य, धन आदि) प्राप्त करने की इच्छा करनेवाला पुरुष राग, लोभ आदि से मूढ अर्थात्‌ प्रचुर राग ओर लोभ से अभिभूत अपने चित्त से आहत होकर पूर्वावस्था में ही पतनरूप गर्त में गिर जाता है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है हे मुने ! आजकल के मनुष्य गड के वृक्षों के समान हैं, क्योकि जैसे गड्ढे के वृक्ष के छाया, लता, पत्ते, फल फूल आदि गड्ढे में ही रह जाते हैं, अंशतः भी प्राणी उनका भोग नहीं कर सकते, वैसे ही मनुष्य भी अपने शरीर के पोषण के लिए ही अपनी विद्या, विनय, धन, सम्पत्ति आदि को व्यर्थ नष्ट कर देते हैं उनसे किसी दूसरे का उपकार नहीं होता