Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 27, Verses 1–3
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 27, verses 1–3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 27 · श्लोक 1-3
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
अन्यच्च ताताऽतितरामरम्ये मनोरमे चेह जगत्स्वरूपे ।
न किंचिदायाति तदर्थजातं येनातिविश्रान्तिमुपैति चेतः ॥ १ ॥
बाल्ये गते कल्पितकेलिलोले मनोमृगे दारदरीषु जीर्णे ।
शरीरके जर्जरतां प्रयाते विदूयते केवलमेव लोकः ॥ २ ॥
जरातुषाराभिहतां शरीरसरोजिनीं दूरतरे विमुच्य ।
क्षणाद्गते जीवितचञ्चरीके जनस्य संसारसरोऽवशुष्कम् ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
() "य आदित्ये तिष्ठन्“ इत्यादि श्रुति से अपने में अधीष्ठित ईश्वर से प्रेरित होनेवाला एवं चट्टान,
पहाड़ आदि दुर्गम स्थानों में किरणरूपी घोड़े के पैरों से चलते हुए से सूर्य में रथ की कल्पना की गई है।
सत्ताईसवाँ सर्ग
पूर्व में उक्त और अनुक्त मोक्ष के विरोधी पदार्थों में, वैराग्य के लिए, विस्तारपूर्वक दोषों का वर्णन ।
पहले जो कहे जा चुके हैं और जो नहीं कहे गये, उन सम्पूर्ण पदार्थों में अन्यान्य दोषों को दशाति हुए
अपने चित्त की शान्ति के कारणीभूत पदार्थ की अप्राप्ति को दशति हैं।
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : मुनिवर, और सुनिए, वस्तुतः अत्यन्त अरमणीय पर जब तक विचार नहीं
किया जाता है, तब तक रमणीय सा मालूम पड़ने वाले इस जगत् में जिस पदार्थ के प्राप्त होने से चित्त
में शान्ति (पूर्णकामता) प्राप्त हो वैसा कोई भी पर्दाथ मेरी समझ में नहीं आता । विचार कर देखिए,
बाल्यावस्था विविध प्रकार से कल्पित क्रीड़ाकौतुक में ही बीत जाती है, उसमें चित्त की स्थिरता का
लेश भी नहीं रहता । तदुपरान्त यौवन पदार्पण करता है। यौवन में चित्तरूपी मृग स्त्रीरूपी गुफाओं में ही
जीर्ण हो जाता है, उसमें भी चित्त में शान्ति नहीं रहती । तदनन्तर वृद्धावस्था के प्राप्त होने पर शरीर
जीर्ण-शीर्ण हो जाता है, उस समय भी शान्ति नहीं रहती, यों पुरुषार्थसाधनाशून्य अतएव व्यर्थ आयु
बिताने से मनुष्यों को केवल दुःख ही दुःख प्राप्त होता है, सुख-शान्ति का कहीं लेश भी नहीं हे ।
वृद्धावस्थारूपी हिमवर्षा से नष्ट हुई शरीररूपी कमलिनी का परित्याग कर जब प्राणरूपी भ्रमर अतिदूर
चला जाता है, तब मनुष्य का यह संसाररूपी सरोवर सूख जाता है
सर्ग सन्दर्भ
छल्बीसर्वौ सर्ग समाप्त ।