Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 27, Verse 36
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 27, verse 36 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 27 · श्लोक 36
संस्कृत श्लोक
अद्यापि यातेऽपि च कल्पनाया आकाशवल्लीफलवन्महत्त्वे ।
उदेति नो लोभलवाहतानामुदारवृत्तान्तमयी कथैव ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि भोगचमत्कार होता है, तो अभी क्यो विरक्त होते हो ? भोगो को भोगकर वृद्धावस्था में
विरक्त होकर विचार किया जा सकता है, ऐसी आशंका होने पर भोगो मे आसक्ति होने से वैराग्य और
विचार दोनों दुर्लभ हैं, ऐसा कहते हैं।
इस युवावस्था में और आनेवाली वृद्धावस्था मेँ आकाशलता के फल के समान मिथ्यारूप भी
भोगासक्तिकल्पना जब अविचार के कारण वृद्धि को प्राप्त होती है तब भोग और उसके साधनों में
आसक्त पुरुषों में परमात्मा के स्वरूप का निरूपण करनेवाली कथा ही उदित नहीं होती, निरन्तर
उसका विचार करना तो दूर रहा