Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 27, Verse 39
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 27, verse 39 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 27 · श्लोक 39
संस्कृत श्लोक
क्वचिज्जना मार्दवसुन्दरेषु क्वचित्कठोरेषु च संचरन्ति ।
देशान्तरालेषु निरन्तरेषु वनान्तखण्डेष्विव कृष्णसाराः ॥ ३९ ॥
हिन्दी अर्थ
यद्यपि कहीं धार्मिक पुरुष हैं, तथापि विवेकी पुरुष तो अति दुर्लभ हैं, ऐसा कहने के लिए दो प्रकार
के मनुष्यों को कहते है ।
जैसे कृष्णासार मृग गहन जंगलों मेँ इधर-उधर भ्रमण करते हैं, वैसे ही मनुष्य भी कहीं पर दया
उदारता, क्षमा, सौन्दर्य, विद्या, विनय आदि से युक्त सज्जन पुरुषों के समाज में और कहीं पर क्रोध,
लोभ, निष्ठुरता आदि से परिपूर्णं पापासक्त दुराचारियों के साथ विहार करते हैं