Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 27, Verse 4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 27, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 27 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
यदा यदा पाकमुपैति नूनं तदा तदेयं रतिमातनोति ।
जराभराऽनल्पनवप्रसूना विजर्जरा कायलता नराणाम् ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
वृद्धावस्था आक्रान्त,
जिसमें अनेक पलितादि नये-नये फूल खिले हैं और अत्यन्त जीर्ण मनुष्यों की शरीररूपी लता जब
अत्यन्त पाक (परिणाम) को प्राप्त हो जाती है, तब यह मृत्यु को अति आनन्द देती है, अर्थात् जरा-
जीर्ण शरीर को देखकर मृत्यु को बड़ा आनन्द होता है, यह भाव है