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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 27, Verses 5–7

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 27, verses 5–7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 27 · श्लोक 5-7

संस्कृत श्लोक

तृष्णानदी सारतरप्रवाहग्रस्ताखिलानन्तपदार्थजाता । तटस्थसंतोषसुवृक्षमूलनिकाषदक्षा वहतीह लोके ॥ ५ ॥ शारीरनौश्चर्मनिबन्धबद्धा भवाम्बुधावालुलिता भ्रमन्ती । प्रलोड्यते पञ्चभिरिन्द्रियाख्यैरधोभवन्ती मकरैरधीरा ॥ ६ ॥ तृष्णालताकाननचारिणोऽमी शाखाशतं काममहीरुहेषु । परिभ्रमन्तः क्षपयन्ति कालं मनोमृगा नो फलमाप्नुवन्ति ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

इस लोक में तृष्णारूपी नदी निरन्तर बहती है, वह अपने प्रबल वेग से संसार के सम्पूर्ण अनन्त पदार्थो को निगल गई है ओर सन्तोषरूपी तटवृक्ष की जड़ों को खोदने में बड़ी दक्ष है । भाव यह कि संसार के अखिल ओर अनन्त पदार्थो को निगल कर भी इसे सन्तोष नहीं हुआ है । चर्म से आच्छादित यह शरीररूपी नौका संसाररूपी समुद्र में सुख दुःखरूपी तरंगोँ से व्याकुल ओर हलकी होने के कारण स्वयं भी इधर-उधर घूम रही है और इसीलिए नीचे डूबने के लिए तैयार है, पाँच इन्द्रियरूपी मगर भी इसके डूबने में सहायक हो रहे हैं, क्योकि इसमें बैठे हुए जीव वैराग्ययुक्त और धैर्यशाली नहीं है ऋषिजी, जिसमें तृष्णारूपी लताएँ ही अधिक हैं, ऐसे वन में घूमनेवाले ये मनरूपी बन्दर कामरूपी वृक्षों की सैकड़ों शाखाओं में घूमकर व्यर्थ ही आयु क्षीण करते हैं, उन्हें फल कुछ भी प्राप्त नहीं होता । अर्थात्‌ काम विशाल वृक्ष समान है, वह तृष्णारूपी लताओं से आच्छादित भी है, उसकी असंख्य शाखा-प्रशाखाएँ हैं मनरूपी बन्दर फलकी इच्छा से उनमें निरन्तर पर्यटन करते हैं, मगर उन्हें इच्छित फल की प्राप्ति नहीं होती