Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 27, Verses 24–30
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 27, verses 24–30 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 27 · श्लोक 24-30
संस्कृत श्लोक
प्राणापहारैकपरा नराणां मनो मनोहारितया हरन्ति ।
रक्तच्छदाश्चञ्चलषट्पदाक्ष्यो विषद्रुमालोललताः स्त्रियश्च ॥ २४ ॥
इतोऽन्यतश्चोपगता मुधैव समानसंकेतनिबद्धभावा ।
यात्रासमासंगसमा नराणां कलत्रमित्रव्यवहारमाया ॥ २५ ॥
प्रदीपशान्तिष्विव भुक्तभूरिदशास्वतिस्नेहनिबन्धनीषु ।
संसारमालासु चलाचलासु न ज्ञायते तत्त्वमतात्त्विकीषु ॥ २६ ॥
संसारसंरम्भकुचक्रिकेयं प्रावृट्पयोबुद्बुदभङ्गुरपि ।
असावधानस्य जनस्य बुद्धौ चिरस्थिरप्रत्ययमातनोति ॥ २७ ॥
शोभोज्ज्वला दैववशाद्विनष्टा गुणाः स्थिताः संप्रति जर्जरत्वे ।
आश्वासनादूरतरं प्रयाता जनस्य हेमन्त इवाम्बुजस्य ॥ २८ ॥
पुनःपुनर्दैववशादुपेत्य स्वदेहभारेण कृतोपकारः ।
विलूयते यत्र तरुः कुठारैराश्वासने तत्र हि कः प्रसङ्गः ॥ २९ ॥
मनोरमस्याप्यतिदोषवृत्तेरन्तर्विंघाताय समुत्थितस्य ।
विषद्रुमस्येव जनस्य सङ्गादासाद्यते संप्रति मूर्च्छनैव ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे चंचल भ्रमररूपी नयनां से युक्त (चंचल भ्रमरो से सेवित), लाल
पत्तों से आच्छन्न विषवृक्ष पर चढ़ी हुई विषलताएँ देखनेमें अति सुन्दर होने के कारण पहले मनको हर
लेती हैं बाद में प्राणनाशिनी होती हैं, वैसे ही मनुष्यों के प्राणहरण में तत्पर भ्रमर के समान चंचल
नयनवाली ओर विम्ब फल के समान होठोंवाली नारियाँ मनोहर होने के कारण पहले चित्त को चुरा लेती
हैं फिर प्राणों को हर लेती हें । जैसे तीर्थयात्रा या महोत्सव में बहुत से आदमियों का सम्मेलन होता है,
वैसे ही मनुष्यलोक से या स्वर्ग आदि लोकों से व्यर्थ ही आये हुए ओर अमुक स्थानपर हम लोगों की भेंट
होगी यों परस्पर संकेत ओर अभिप्राय से इकडे हुए लोगों मे परस्पर स्त्री, पुत्र, मित्र आदि व्यवहार होता
है । यह व्यवहार माया नहीं है तो ओर क्या है ? संसार (जन्म-मरणकी परम्पराएँ) दीपको के निर्वाण
(बुझने) के अनुरूप हे । जैसे दीपक रात्रिभर प्रचुर तेल ओर बहुत-सी वत्तियों का भक्षणकर अन्त में
बुझ जाता हे, वहाँ पर फिर उसका अस्तित्व प्रतीत नहीं होता अर्थात् प्रचुर तेल और बत्तियों का भक्षण
करनेवाले अतिचंचल अतएव मिथ्याभूत क्षणिक दीपशिखा के निर्वाण प्रवाह में पारमार्थिक वस्तु प्रतीत
नहीं होती; वैसे ही बाल्य आदि सैकड़ों अवस्थाओं का भोग करनेवाले अत्यन्त स्नेह से (राग से)
परिपूर्ण, अत्यन्त चंचल क्षण-विध्वंसी) अतएव मिथ्याभूत संसार में कोई भी वस्तु पारमार्थिक नहीं
हे । यह संसार कुलालके (कुम्हार के) चाक के समान हे । जैसे कुलाल के चाक के खूब जोर से घूमने पर
भी असावधान आदमी को यह नहीं घूम रहा है, स्थिर है, ऐसा भ्रम होता है, वैसे ही यह संसारप्रवृत्तिरूप
कुचक्र भी लोगों को भ्रम में डालता हे । वास्तव में है तो यह वर्षा ऋतु के जल के बुद्बुदं के समान
क्षणभंगुर पर असावधान लोगों की बुद्धि में अपनी चिरस्थायित्त्व की प्रतीति करा देता है । जैसे शरद्ऋतु
में कमल के सौन्दर्य, सुगंध आदि गुण शोभासे देदीप्यमान रहते हैं, किन्तु हेमन्त ऋतु में वे सब नष्ट हो
में फँसाकर दोष से लां छित कर देते हैं | तदुपरान्त रोग उन पर आक्रमण कर उनका नाम-निशान मिटा
देते हैँ । संस्कृत टीकाकारो ने इस श्लोक के और भी अर्थ किये हैँ | प्रिय प्राण, पोषण करनेवाले जिन
नरपशुओं से स्वयं पुष्ट हुए, उन्हीं नरपशुओं को बलात्कार से निन्दित कर्मरूपी जाल मेँ फँसाकर काल
के (मृत्यु के) सम्मुख कर देते हैं अर्थात् काल को उपहार देते हैँ, अतएव प्राण शरीर के विनाशक होने के
कारण प्रिय नहीं हैं, किन्तु अप्रिय (शत्रु) ही हैं | इसमें निष्कर्ष यह निकला कि मनुष्य को केवल प्राणों के
पोषण में ही तत्पर नहीं रहना चाहिए । अथवा - यद्यपि मूढ जन प्राणो के पोषण में सदा तत्पर रहते हैं
तथापि वे प्रियप्राण (प्राणों के प्रति प्रेम करनेवाले) नहीं कहे जा सकते, क्योकि वे तो उलटे मृत्यु के मुँह
में डालनेवाले उपायों के आचरण द्वारा प्राणों के नाशक ही हैँ । वास्तव में तत्त्वज्ञ पुरुष ही प्राणों पर प्रेम
करनेवाले हैं । क्योकि वे तत्त्वदृष्टि से प्राणो मेँ नित्य आत्मभाव प्राप्त कर उनके रक्षक हैँ । अतएव वे
प्रिय-प्राण गर्हित कर्मों में फँसे हुए मूढ़ जनरूपी पशुओं का आदर नहीं करते | उत्तरार्द्ध से मूढ जनों की
अपेक्षा शरीर के बाध से अपरिच्छिन्नता को प्राप्त हुए हैं, उनकी मूढ जनों की नाई देह मेँ आत्मबुद्धि नहीं
हो सकती । मूढ़जनों की अपेक्षा तत्त्वज्ञों में यही विशेषता है ।
जाते हैं, फिर उनसे न चित्त को शांति मिलती है और न प्राणेन्द्रिय को तृप्ति ही मिलती है, वैसे ही
यौवनावस्था में मनुष्य के जो कौमार्य और सौन्दर्य आदि गुणगण शोभा से उज्जवल रहते हैं, वे वृद्धावस्था
में भाग्यवश विनष्ट होकर दुर्लभ हो जाते हैं, इसलिए उनमें विश्वास करना उचित नहीं हे । इस संसार
में बेचारा वृक्ष पृथिवी, जल, वायु आदि तत्त्वों के कारण, न कि किसी पुरुष द्वारा किये गये उपकार के
कारण, जन्म, वृद्धि और फल-मूल आदि समृद्धि को प्राप्त होकर अपने देहधारण से छाया, पत्तियाँ,
फूल फल आदि द्वारा बारबार लोगों का उपकार करता है, किसी का तनिक भी अपराध नहीं करता,
फिर भी वह कुल्हाडियों से काटा जाता है। भला बतलाइए तो सही, ऐसे कृतघ्न संसार में पद-पद में
जिससे अपराध हो सकते हैं और जिससे किसीका उपकार भी नहीं हो सकता, ऐसे मनुष्य के विषय में
क्या विश्वास किया जा सकता है ? भाव यह कि यदि वह अपकार न भी करे, तो भी मृत्यु उसका नाश
कर डालेगी | मृत्यु के घर में उपकारी और अपकारी के प्रति कोई भेदभाव नहीं है । आत्मीय जनों का
संसर्ग विषवृक्ष के संसर्ग के तुल्य हे । देखिये न ! विषवृक्ष देखने में बड़ा सुन्दर लगता है और आत्मीय
जन भी आपाततः (विचार के बिना) सुन्दर प्रतीत होते हैं। जिस पुरुष का विषवृक्ष से सम्बन्ध होता है,
उसको दाह ओर मूर्च्छा आदि होते हैं और आत्मीय जनका संसर्ग भी स्नेह ओर भोग आदि उत्पन्न
करता हे । विषवृक्ष जीवननाश का कारण है ओर आत्मीय जन भी जीवन के समान प्रिय आत्मज्ञान के
विनाश का हेतु हे । जैसे विषवृक्ष के संसर्ग से मूर्च्छा होती है, वेसे ही आत्मीय जनके संसर्ग से मूढता
प्राप्त होती है। अर्थात् इसका यही एक बड़ा भारी दोष है