Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 27, Verse 10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 27, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 27 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
अक्लिष्टपर्यन्तफलाभिरामा न दृश्यते कस्यचिदेव काचित् ।
क्रियादुराशाहतचित्तवृत्तिर्यामेत्य विश्रान्तिमुपैति लोकः ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
कर्म ही देह, इन्द्रियरूपी सागर को तरने का उपाय है, ऐसी शंका पर कहते हैं।
किसीकी कोई भी क्रिया संसार के आत्यन्तिक विनाशरूप फल को देनेवाली नहीं है । क्रियारूपी दुराशा
पिशाची द्वारा जिसकी चित्तवृत्ति नष्ट हो गई है, ऐसा पुरुष जिस क्रिया का अवलम्बन कर विश्रान्ति को
प्राप्त हो, ऐसी क्रिया कोई नहीं दिखाई देती, क्योकि "तद् यथेह कर्मचितो लोक: ' अर्थात् जैसे इस लोक
में कृषि आदि कर्म से प्राप्त उपार्जित स्वर्ग आदि लोक भी क्षीण हो जाते हैं, ऐसी श्रुति है अतएव कर्म
सेजो फल उत्पन्न होता है, उसका अवश्य विनाश हो जाता है, ऐसा नियम लोक में देखा भी जाता हे