Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 27, Verses 17–22
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 27, verses 17–22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 27 · श्लोक 17-22
संस्कृत श्लोक
इमान्यमूनीहि विभावितानि कार्याण्यपर्यन्तमनोरमाणि ।
जनस्य जायाजनरञ्जनेन जवाज्जरान्तं जरयन्ति चेतः ॥ १७ ॥
पर्णानि जीर्णानि यथा तरूणां समेत्य जन्माशु लयं प्रयान्ति ।
तथैव लोकाः स्वविवेकहीनाः समेत्य गच्छन्ति कुतोऽप्यहोभिः ॥ १८ ॥
इतस्ततो दूरतरं विहृत्य प्रविश्य गेहं दिवसावसाने ।
विवेकिलोकाश्रयसाधुकर्म रिक्तेऽह्नि रात्रौ क उपैति निद्राम् ॥ १९ ॥
विद्राविते शत्रुजने समस्ते समागतायामभितश्च लक्ष्म्याम् ।
सेव्यन्त एतानि सुखानि यावत्तावत्समायाति कुतोऽपि मृत्युः ॥ २० ॥
कुतोऽपि संवर्धिततुच्छरूपैर्भावैरमीभिः क्षणनष्टदृष्टैः ।
विलोड्यमाना जनता जगत्यां नवेत्युपायातमहो न पातम् ॥ २१ ॥
प्रियासुभिः कालमुखं क्रियन्ते जनैडकास्ते हतकर्मबद्धाः ।
यैः पीनतामेव बलादुपेत्य शरीरबाधेन न ते भवन्ति ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
आसुरसम्पत्ति के विस्तारपूर्वक प्रदर्शन द्वारा पूर्वोक्त अर्थ को ही विशद करते हैं ।
ये कार्य यहीं और अभी कर्तव्य हैं और ये अन्य प्रदेश और अन्य काल में करणीय हैं, यों जिन कार्यो
की सदा चिन्ता बनी रहती है और अन्त में जिनका फल अनर्थ ही है । उन कार्यो का प्रयोजन स्त्रियों तथा
अन्यान्य लोगों की प्रसन्नताका उत्पादन (मनोरंजन) ही है, पर वे देह के वृद्ध होने तक लोगों के चित्त
को जबरदस्ती विवेक से भ्रष्ट कर देते हैं। जैसे वृक्षों के जीर्णं पत्ते जन्म लेकर शीघ्र नाश को प्राप्त हो
जाते हैं, वैसे ही आत्म-विवेक से रहित लोग इस लोक में जन्म लेकर थोड़े ही दिनों में कहीं चले जाते
हैं, अर्थात् विनष्ट हो जाते हैं। महाभाग, भला बतलाइए तो सही, मूढ़ व्यक्ति के सिवा कौन ज्ञानी जन
विवेकी पुरुषों की सेवा और सत्कर्म से रहित दिन में इधर-उधर दूर तक घूम-फिरकर और सांयकाल
के समय घर में आकर रात्रि में सुख की नींद सोयेगा ? दिन में विवेकियों की सेवा से रहित ओर सत्कर्मो
से शून्य होने पर ज्ञानी को तो रात्रि में नींद ही नहीं आ सकती, पर अज्ञानी ही दिन में विवेकी जनों की
सेवा और सत्कर्मों में शून्य होने पर भी इधर-उधर घूम-फिरकर सांयकाल में अपने घर में प्रवेश कर खूब
सुख की नींद सोता है। सम्पूर्ण शत्रुओं के छिन्न-भिन्न होने पर और चारों ओर से धन-सम्पत्ति की वृष्टि
होने पर जब पुरुष इन सांसारिक भोगों को भोगने लगता है तभी न मालूम कहाँसे आकर मृत्यु सामने खड़ी
हो जाती है। इस संसार में सभी लोगों को किसी एक अनिर्देश्य अदभुत कारण से अभिवृद्धि को प्राप्त हुए,
अत्यन्त तुच्छ और क्षणभर में जन्म लेकर नष्ट होनेवाले अर्थात् विनाशशील इन विषयों ने भ्रम में डाल
रक्खा है, मोहित कर रक्खा है; अतएव वे लोग समीप में आई हुई मृत्यु को नहीं जानते, यह कम आश्चर्य
की बात नहीं है। जिन लोगों ने विषयों पर आसक्ति, देह के लालन-पालन आदि द्वारा हृष्ट-पुष्ट-शरीर
होना ही उचित समझा अर्थात् विवेक, वैराग्य आदि का अभ्यास नहीं किया, वे ठहरे निरे नरपशु । सब
प्राणियों के परम प्रिय यजमानरूप प्राण उन्हीं नररूप पशुओं को (बकरों को) निन्दित कर्मरूपी यज्ञस्तम्भों
में बाँधकर दोषरूपी कालिखसे उनका मुँह काला कर देते हैं। तदुपरान्त रोगरूपी ऋत्विजों द्वारा हनन,
अंगछेदन आदि से शरीर का नाश होने के कारण वे असत्प्राय हो जाते हैं