Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 27, Verses 32–34
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 27, verses 32–34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 27 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
कल्पाभिधानक्षणजीविनो हि कल्पौघसंख्याकलने विरिञ्चयाः ।
अतः कलाशालिनि कालजाले लघुत्वदीर्घत्वधियोऽप्यसत्याः ॥ ३२ ॥
सर्वत्र पाषाणमया महीध्रा मृदा मही दारुभिरेव वृक्षाः ।
मांसैर्जनाः पौरुषबद्धभावा नापूर्वमस्तीह विकारहीनम् ॥ ३३ ॥
आलोक्यते चेतनयाऽनुविद्धा पयोनुबद्धोऽस्तनयो नभः स्थाः ।
पृथग्विभागेन पदार्थलक्ष्म्या एतज्जगन्नेतरदस्ति किंचित् ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि शंका हो कि इस लोक के जनों के विनाशी होने पर भी ब्रह्मलोक को प्राप्त हुए लोगों का, जो
कि कल्पआयु हैं, विनाश नहीं होता, तो इस पर कहते हैं।
व्यतीत और आनेवाले अनन्त कल्पो की संख्या का परिज्ञान नहीं होता, अतएव जैसे क्षण अनन्त
हैं, वैसे ही कल्प भी अनन्त ठहरे, इसलिए विष्णु, रूद्र आदि की दृष्टि से कल्प भी क्षण ही हैं। अतएव
ब्रह्मलोकवासी जन भी कल्प नामक क्षणभर जीनेवाले हुए । अवयवयुक्त कालसमूह में लघुत्व और
दीर्घत्व बुद्धि एवं चिरजीवन और अचिरजीवन बुद्धि भी, द्रष्टा की कल्पना के अधीन होने से, असत्य है ।
तुल्यन्याय से ब्रह्माण्ड भी अनन्त कोटि ब्रह्माण्डं को देखनेवालों की दृष्टि में अणुरूप ही है, इसलिए
अणुत्व ओर महत्त्वबुद्धि भी असत्य ही है