Vairagya Prakarana (Dispassion) · Sarga 11
ढसवाँ सर्ग समाप्त ग्यारहवाँ सर्ग अनुचर के मुँह से श्रीरामजी की अवस्था सुनने पर विश्वामित्रजी का उनसे उदास होने का कारण पूछना।
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- Verse 1श्रीरामचन्द्रजी का वृत्तान्त सुनकर विश्वामित्रजी ने कहा : हे महाप्राज्ञ लोगों, श्रीरामचन्…
- Verse 2वैराग्य ओर विवेक से युक्त श्रीरामचन्द्रजी का यह मोह किन्ही आपत्तियों से अथवा रागवश नहीं ह…
- Verse 3श्रीरामचन्द्रजी शीघ्र यहाँ आयें और यहीं पर जैसे वायु पर्वत में स्थित मेघ को उड़ा देता है,…
- Verse 4उपाय द्वारा उक्त मोह के दूर कर देने पर श्रीरामचन्द्रजी हम लोगों की भाँति "तद्विष्णोः परमं…
- Verse 5मोह के हट जाने पर श्रीरामजी अमृत पिये हुए पुरुष की नाई ब्रह्मरूप, परमानन्दसम्पन्न, अपरिच्…
- Verse 6माननीय श्रीरामचन्द्रजी तदनन्तर स्वस्थचित्त होकर अपने वर्ण ओर आश्रम के अनुरूप सम्पूर्ण व्य…
- Verse 7मनन आदि से उत्पन्न ज्ञान की दृढ़तारूप बल से युक्त श्रीरामचन्द्रजी को लोक में कार्यतत्त्व…
- Verse 8मुनिश्रेष्ठ श्रीविश्वामित्रजी के यों कहने पर राजा दशरथ का चित्त आह्वादित हो गया, उन्होने…
- Verses 9–10द्वारपालों के गमन के अनन्तर श्रीरामचन्द्रजी पिताजी के निकट जाने के लिए, जैसे सूर्य पर्वत…
- Verses 11–13श्रीरामचन्द्रजी ने देववृन्द से परिवृत इन्द्र के सदृश राजाओं के मण्डल के मध्य में विराजमान…
- Verse 14इधर वसिष्ठ, विश्वामित्र आदि ऋषिवृन्द तथा महाराज दशरथ आदि राजवृन्द ने दूर से अपने निकट आ र…
- Verses 15–17शान्ति और विवेक के हेतु सत्त्वगुण से सम्पन्न, सकलजनसेवनीय, असीम ओर व्यक्त आह्नादकता से यु…
- Verses 18–19उन्होने संसार की गतिविधि का विचार कर लिया था, वे पवित्रगुणवाले लोगों के आश्रय थे और गुणों…
- Verses 20–21इस प्रकार अनेक गुणों से परिपूर्ण और अत्यन्त निर्मल परिमित हार ओर वस्त्रं से सुशोभित श्रीर…
- Verse 22जबकि विश्वामित्रजी "रामचन्द्रजी को लाओ" यों रामचन्द्रजी के विषय में राजा से कह रहे थे, उस…
- Verse 23श्रीरामचन्द्रजी ने पहले-पहले पिताजी को प्रणाम किया । तदुपरान्त माननीय पुरुषों द्वारा भी प…
- Verse 24तदनन्तर ब्राह्मणों को, बन्धुओं को और अपने बड़े-बूढ़ों को प्रणाम किया | तदनन्तर राजाओं द्व…
- Verse 25समचित्त ओर देवतुल्य दर्शनीय श्रीरामचन्द्रजी मुनियों का आशीर्वाद ग्रहणकर पिताजी की पवित्र…
- Verse 26स्नेहमय राजा ने प्रणामशील रामचन्द्रजी का सिर सूँघकर आलिंगन किया और जैसे राजहंस कमल को चूम…
- Verse 27शत्रुतापन राजा ने श्रीरामचन्द्रजी की ही नाईं लक्ष्मण और शत्रुघ्न का भी आलिंगन और चुम्बन क…
- Verse 28आलिंगन करने के पश्चात् राजा के "वत्स, मेरी गोद में बैठो” यह कहने पर श्रीरामचन्द्रजी भूमि…
- Verses 29–31राजा दशरथ ने कहा : पुत्र तुम विवेकसम्पन्न हो एवं विविध कल्याणो के भाजन हो, तुम अविवेकियों…
- Verse 32पुत्र, तभी तक आपत्तियाँ निर्बल होकर दूर रहती हैं, जब तक मोह को अवकाश नहीं दिया जाता। मोह…
- Verse 33ऐसे प्रभावशाली होने पर भी मूढ लोगों के योग्य विक्षेपरूप बड़ी तरंगों से महान् आवरणरूप शैत…
- Verse 34श्रीविश्वामित्रजी ने कहा : राजकुमार, चित्त द्वारा की गई चंचल नीलकमलों के तुल्य नेत्रोंकी…
- Verse 35जैसे घर को चूहे खोद डालते हैं, वैसे ही जो मन की व्यथाएँ आपके चित्तको दुःखी कर रही हैं। वे…
- Verse 36मानसिक व्यथाओं के कारण जगत् मे प्रसिद्ध ही हैं, उनके लिए प्रश्न क्यो करते हैं 2 इस शंका…
- Verse 37हे अनघ ! जिस पदार्थकी आपको अभिलाषा हो उसे शीघ्र किये, वह आपको अवश्य मिलेगा, जिसकी प्राप्त…
- Verse 38श्रीरामचन्द्रजी ने महामुनि श्रीविश्वामित्रजी के उक्त वाक्य को, जिसके गर्भ में अपनी अभिलाष…