Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 11, Verses 18–19
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 11, verses 18–19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 11 · श्लोक 18,19
संस्कृत श्लोक
विचारितजगद्यात्रं पवित्रगुणगोचरम् ।
महासत्त्वैकलोभेन गुणैरिव समाश्रितम् ॥ १८ ॥
उदारमार्यमापूर्णमन्तःकरणकोटरम् ।
अविक्षुभितया वृत्त्या दर्शयन्तमनुत्तमम् ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
उन्होने संसार की गतिविधि का विचार
कर लिया था, वे पवित्रगुणवाले लोगों के आश्रय थे और गुणों ने मानों सत्त्वगुण के लोभ से उनका
आश्रय लिया हुआ था । श्रीरामजी उदारस्वभाव शिष्ट ओर दर्शनीय थे । वे क्षोभरहित स्थिति से सम्पूर्ण
साधनसम्पत्ति होने पर भी तत्त्वज्ञानरूप परमानन्द प्राप्त न होने के कारण अपने अन्तःकरणकोटर को
(मनोरथ को) अपूर्ण-सा दिखा रहे थे