Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 11, Verses 20–21
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 11, verses 20–21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 11 · श्लोक 20,21
संस्कृत श्लोक
एवङ्गुणगणाकीर्णो दूरादेव रघूद्वहः ।
परिमेयस्मिताच्छाच्छस्वहाराम्बरपल्लवः ॥ २० ॥
प्रणनाम चलच्चारुचूडामणिमरीचिना ।
शिरसा वसुधाकम्पलोलदेवाचलश्रिया ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार अनेक गुणों से परिपूर्ण और अत्यन्त
निर्मल परिमित हार ओर वस्त्रं से सुशोभित श्रीरामचन्द्रजी ने दूर से ही चंचल और सुन्दर चूडामणि की
(सिर के रत्न की) किरणों से देदीप्यमान अतएव भूकम्प से चंचल सुमेरु के सदृश सुन्दर मस्तक से
प्रणाम किया