Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 11, Verses 11–13
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 11, verses 11–13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 11 · श्लोक 11-13
संस्कृत श्लोक
दूरादेव ददर्शासौ रामो दशरथं तदा ।
वृतं राजसमूहेन देवौघेनेव वासवम् ॥ ११ ॥
वसिष्ठविश्वामित्राभ्यां सेवितं पार्श्वयोर्द्वयोः ।
सर्वशास्त्रार्थतज्ज्ञेन मन्त्रिवृन्देन मालितम् ॥ १२ ॥
चारुचामरहस्ताभिः कान्ताभिः समुपासितम् ।
ककुब्भिरिव मूर्ताभिः संस्थिताभिर्यथोचितम् ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामचन्द्रजी ने देववृन्द से परिवृत इन्द्र के सदृश राजाओं के मण्डल के मध्य में विराजमान महाराज
दशरथ के दूर से ही दर्शन किये उनके अगल-बगल में बैठे श्रीवसिष्ठजी और विश्वामित्रजी उनसे
प्रिय, हित और मधुर वार्तालाप कर रहे थे एवं चारों ओर, शास्त्रों के अर्थ का विस्तार करनेवाले नीतिज्ञ
मन्त्री, मालाकार पंक्ति बाँधकर बैठे थे । यथायोग्य स्थान पर खड़ी हुई अतएव मूर्तिमती दिशाओं के
सदृश, हाथ में सुन्दर चँवर ली हुईं ललनाएँ महाराज पर चँवर डुला रही थीं