Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 11, Verse 36
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 11, verse 36 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 11 · श्लोक 36
संस्कृत श्लोक
मन्ये नानुचितानां त्वमाधीनां पदमुत्तमम् ।
आपत्सु चाऽप्रयोज्यं ते निहीना अपि चाधयः ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
मानसिक व्यथाओं के कारण जगत् मे प्रसिद्ध ही हैं, उनके लिए प्रश्न क्यो करते हैं 2 इस शंका पर
कहते है।
ठीक है मन की व्यथाओं के कारण प्रसिद्ध है, पर आप उन अनुचित व्यथाओंके उचित पात्र नहीं
है । आपन्न (आपत्तियुक्त) अथवा दरिद्र ही उनका पात्र हो सकता हे । आपकी सभी आपत्तियाँ आपके
पिताजी के प्रताप से ही नष्ट है, अतः आपके द्वारा आपत्तियो मेँ निरसनीय कुछ है ही नहीं ओर फिर
आपकी आपत्तियाँ तो स्वतः ही निरस्त हैं