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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 11, Verses 9–10

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 11, verses 9–10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 11 · श्लोक 9,10

संस्कृत श्लोक

एतावताथ कालेन रामो निजगृहासनात् । पितुः सकाशमागन्तुमुत्थितोऽर्क इवाचलात् ॥ ९ ॥ वृतः कतिपयैर्भृत्यैर्भ्रातृभ्यां च जगाम ह । तत्पुण्यं स्वपितुः स्थानं स्वर्गं सुरपतेरिव ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

द्वारपालों के गमन के अनन्तर श्रीरामचन्द्रजी पिताजी के निकट जाने के लिए, जैसे सूर्य पर्वत से उदित होता है वैसे ही अपने घर के आसन से उठकर थोड़े से अनुचरों और दो भाइयों (लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न) के साथ जितने समय में राजा और मुनि का संवाद हुआ उतने ही समय में इन्द्र की स्वर्गभूमि के समान रमणीय पिताजी के पवित्रतम निवासस्थान में गये