Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 11, Verse 38
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 11, verse 38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 11 · श्लोक 38
संस्कृत श्लोक
इत्युक्तमस्य सुमते रघुवंशकेतुराकर्ण्य वाक्यमुचितार्थविलासगर्भम् ।
तत्याज खेदमभिगर्जति वारिवाहे बर्ही यथा त्वनुमिताभिमतार्थसिद्धिः ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामचन्द्रजी ने महामुनि श्रीविश्वामित्रजी के उक्त वाक्य को, जिसके गर्भ में अपनी
अभिलाषाओं के अनुकूल प्रकाश निहित है, सुनकर खेद त्याग दिया, जैसे कि मेघ के गजनि पर अपने
अभिमत पदार्थो की सिद्धि का अनुमान करनेवाला मयूर खेद को छोड़ देता है