Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 11, Verse 37
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 11, verse 37 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 11 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
यथाभिमतमाशु त्वं ब्रूहि प्राप्स्यसि चानघ ।
सर्वमेव पुनर्येन भेत्स्यन्ते त्वां तु नाधयः ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
हे अनघ ! जिस पदार्थकी आपको अभिलाषा हो उसे
शीघ्र किये, वह आपको अवश्य मिलेगा, जिसकी प्राप्ति से फिर मानसिक व्यथाएँ आपको कष्ट नहीं
पहुँचायेगी