Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 77
छिहत्तरवाँ सर्ग समाप्त सतहत्तरवाँ सर्ग पहले रात्रि का वर्णन, तदनन्तर कर्कटी को राजा और मन्त्री का दर्शन और उनसे कर्कटी की प्रश्न करने की इच्छा का विस्तार से वर्णन ।
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- Verses 1–11श्रीवसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामचन्द्रजी, इस बीचमें, जब कि वह किरातों के देश में गई, अत्यन्त…
- Verses 12–15के पर्वत के तुल्य चंचल थी, प्रलयकालीन एकमात्र समुद्र के पंक के पर्वत के मध्यभाग के समान व…
- Verses 16–19उस समय यानी उस भीषण रात्रि में किरातो के नगर का विक्रम नामक राजा, जो बड़ा धैर्यवान् था,…
- Verse 20अनात्मज्ञ पुरुष इस लोक में ओर परलोक मेँ विनाश और दुःख के लिए जीवन धारण करता है । इसलिए मू…
- Verses 21–22अपने यथार्थ स्वरूप को न देख रहे मूढ का मरण ही जीवन है यानी जीवन से मरण अच्छा है । मरण से…
- Verse 23इसलिए मेरे भोज्य बने हुए इन दोनों को मैं आज ही खा डालूँगी । अभागा जीव ही हाथ में आये हुए…
- Verse 24शायद ये दोनों गुणयुक्त महाशय हों, गुणवान् नरका विनाश करना मुझे स्वभावतः अच्छा नहीं लगता
- Verse 25इसलिए मैं इन दोनों की परीक्षा करती हूँ, यदि ये उस प्रकार के गुणों से युक्त होगे, तो मैं उ…
- Verse 26जो पुरुष स्वाभाविक (अक्षय) सुख, कीर्ति और आयु को चाहता हो, उसे चाहिए कि वह सम्पूर्ण अभीष्…
- Verses 27–28भले ही मैं इस देह के साथ नष्ट हो जाऊँ, पर गुणवान् को मैं नहीं खाऊँगी, क्योकि गुणवान् सज…
- Verse 29जब राक्षसी होकर भी मैं गुणवान् की रक्षा करती हूँ, तब अन्य कौन पुरुष गुणवान् पुरूष को गल…
- Verse 30जो देही (प्राणी) उदार गुणों से युक्त होकर इस संसार में विहार करते हैं, धरातल के चन्द्रमार…
- Verses 31–33गुणी पुरुषों का तिरस्कार करना मरण है ओर गुणवान् की संगति करना जीवन है । गुणिसंगतिरूपी जी…