Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 72
इकहत्तरवाँ सर्ग समाप्त बहत्तरवाँ सर्ग सूची के भीषण तप का वर्णन और उससे आश्चर्य मग्न इन्द्र का नारदोक्ति से निश्चय-कथन |
21 verse-groups
- Verses 1–2श्रीवसिष्ठजी ने कहा : भद्र श्रीरामजी, इस प्रकार शोकमग्न हुई उस सूची ने मौन होकर, अत्यन्त…
- Verses 3–4उसने पहले आत्मा में (अपने मे) मन से कल्पित जो सूचिता है, उसीको देखा । शंका : क्रियाशक्ति…
- Verses 5–8सम्पूर्ण प्राणियों से रहित, वनाग्नि की लपटों से पूर्ण, सूर्य के ताप से रूक्ष, धूलि से धूस…
- Verse 9ही उसकी स्थिरता सिद्ध हुई
- Verse 10उस सूची ने जंगल में मारे भूख के क्षुब्ध हुई अतएव अपने समीप में आनेवाले जंगल के बटोहियों क…
- Verse 11सूचिका के छिद्र से निकली हुई धूप भी, सूचिकाकार होने के कारण, उसकी सखी हई, ऐसी उत्प्रेक्षा…
- Verse 12अत्यंत क्षुद्र भी अपने आत्मीय जीव में लोगों को प्रेम होता है, किरण ने भी शुद्ध होने के का…
- Verse 13उस सूची की अपनी छाया भी दूसरी तापसी सखी हुई, सूची के समान मलिन उस छायासूची को उसने अपनी प…
- Verse 14उन तीनों सूचियों के परस्पर शिर और मूल के यूँथने से परस्पर सम्बंध होने के कारण मानों उन्हो…
- Verse 15इस प्रकार तपस्या कर रही सूची को अपने सामने देखकर पेड़, लता आदि को भी सद्बुद्धि प्राप्त हो…
- Verse 16तप करने के लिए स्थिर अपनी मनोवृत्ति के समान उत्पन्न हुई उस सूची को पेड, लता आदि ने अपने फ…
- Verse 17भाग्यवश द्वुमलता आदि ने फूल के पराग से सूची के मुख को ढक दिया, ऐसी उत्प्रेक्षा करते हैं ।…
- Verse 18भाग्यवश उसके छेद में वायु से प्रेरित माँस आदि के अपवित्र कणों के प्रवेश की इन्द्र द्वारा…
- Verse 19दृढ निश्चय होने के कारण उसने उन पुष्परजों को और मांसकणों को नहीं निगला, अन्तःसार होने के…
- Verse 20अपने मुँह में स्थित फूल के परागों को भी वह नहीं पीती है, यह देखकर वायु को सुमेरूपर्वत को…
- Verses 21–23इस प्रकार अन्य विध्नो से भी वह अपने कार्य से विचलित नहीं हुई, ऐसा कहते हैं। यद्यपि वह कीच…
- Verses 24–26इस प्रकार तप कर रही उसके पापों का क्षय होने से और चिरकाल तक चित्त की एकाग्रता से उसको विच…
- Verse 27इस प्रकार उसने ऊपर को मुख करके हजारों वर्ष तक कठोर तपस्या की, जो चतुर्दश महालोकों को सन्त…
- Verse 28उसकी प्रलयाग्नि के समान भीषण तपस्या से हिमालय पर्वत जल उठा, तदनन्तर उसने जगत् को प्रज्वल…
- Verses 29–30तदनन्तर इन्द्र ने यह जगत् किसकी तपश्चर्या से आक्रान्त है, - ऐसा नारदजी से पूछा । नारदजी…
- Verse 31॥ हे इन्द्र, भगवान् रुद्र की संहारशक्ति के समान सूची की तपस्या से हाथी निःश्वास छोड रहे…