Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 97
छियानबेवाँ सर्ग समाप्त सत्तानबेवाँ सर्ग ब्रह्म के सर्वशक्ति होने के कारण सर्ववादियो की उक्ति की सत्यता, सब लोगों की भोगों मेँ आसक्ति तथा तत््वज्ञानियोँ की विरलता का वर्णन।
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- Verse 1ब्रह्म के सर्वशक्ति होने के कारण सक्षी वादियों की उक्ति सत्य है, इस कहे जाने काले अर्थ मे…
- Verse 2योंब्रह्मरुप से सक सत्य होते हुए भी प्रतीयमान रपसे कैसे सव सत्य हुआ 2 क्योंकि रज्जुरुप के…
- Verse 3तब पहले यह जो कहा ग्या ह कि ऐसी कर वस्तु हैं ही नहीं जो झूठी न हो, इस कवन की क्या गति होग…
- Verse 4मोहरूप है, इसलिए सत्व आदि तीन गुणों की साम्य अवस्थारूप मूलकारण अव्यक्त से (प्रधान से) प्र…
- Verse 5जो कि वेदान्तियों का मत है- यह सारा दृश्यवर्ग ब्रह्म का विवर्त है, वह भी सत् है । क्योकि…
- Verse 6इसी प्रकार कणाद. गोतमः, सोत्रान्तिक, वैभाषिक, जैन आदि के मतों में जो यह माना गया है कि सा…
- Verses 6–7इस लोक और परलोक में जो कुछ देखा जाता है, वह वैसा ही है, न वह सत् है या न असत् ही है यान…
- Verse 8इसी तरह जो दूसरे वादी यानी चार्वाक हैं, वे कहते हैं कि पृथ्वी आदि चार भूतों का ही यह जगत्…
- Verse 9जो क्षणिकविज्ञानवादी हैं, उनका जो यह कहना है कि प्रतिक्षण में परिणाम को प्राप्त करनेवाले…
- Verse 10जैसे घड़े में बन्द बटेर (तीतर की तरह की एक छोटी चिड़िया) घड़े का मुँह खोल देने पर उड़कर ब…
- Verse 11जो सन्त पुरूष हैं वे तो ब्राह्मण, अग्नि, विष, अमृत, मरण, जन्म आदि सभी में जो कभी-कभी अत्य…
- Verse 12यह जगत स्वभाव से ही उत्पन्न होता है एवं नष्ट हो जाता है, जगत् का कोई भी कर्ता नहीं है, य…
- Verse 13पृथ्वी, अंकुर आदि सव कार्यों मे एक ही कर्ता है, यो कल्पना जो कोर्ड करते हैं; वह भी सत्य ह…
- Verse 14आस्तिको के मत में जैसे यह लोक हे, वैसे परलोक भी है, अतः परलोकार्थियों के लिए तीर्थ-स्नान,…
- Verse 15समस्त प्रपंच शून्यात्मक ही है, इस प्रकार की बौद्धो की कल्पना है । उनकी यह कल्पना भी सत्य…
- Verse 16सव वादियो को अपना अपना जो अभीष्ट बिद्धः हो जाता है उसमे प्रमाण कहते हैं / आत्मचिति एक चिन…
- Verse 17यह जगत् न तो शून्य है ओर न अशून्य है, किन्तु अनिर्वचनीय है, इस प्रकार एक तृतीय अनिर्वचनी…
- Verse 18इसलिए जिस किसी अपने निश्चय में दृढ़रूप से स्थित जो भी कोई हो, वह यदि चपलतावश उस निश्चय से…
- Verse 19इसीलिए अविचारों से जिस किसी का सिद्धान्त मान लेना अच्छा नहीं; यह कहते हैं । भद्र, बुद्धिम…
- Verse 20श्रेष्ट पण्डित का लक्षण कहते हैं / अध्ययन और सदाचरण से जिस देश में जो भी उत्तम बुद्धि से…
- Verse 21भद्र, सत्शास्त्र के अनुसार व्यवहार करनेवाले, तत्त्वबोधार्थवाद करनेवाले सज्जन पुरुषों के म…
- Verse 22तव क्या अन्य श्रेष्ठ।निश्वयों में।निष्ठा रखना।निष्फल है, इस प्रश्न का नकारात्मक उत्तर देत…
- Verse 23सत् शास्र और सद्गुरु दोनों का जल्दी से जल्दी आश्रय लेना चाहिए, क्योकि आयुष्य विश्वासयोग्…
- Verse 24रोगो की तृष्णाएँ अति प्रबल हैं; अत: उनसे विरक्त मुमु दुर्लभ हैं; उनमें भी परमात्मा के स्व…
- Verse 25सत्य हैं, ऐसे विद्वान दुर्लभ हैं; फिर भी मनुष्य, गन्धर्व देव, दानव आदि में प्रयत्नपूर्वक…
- Verse 26उन तत्त्वज्ञो को छोड़कर दूसरे सभी मूढ हैं ओर वे मोहरूपी महासागर में संसार चक्रों के आवर्त…
- Verse 27देव आदि जाति विशेषो में उसीका विस्तार पूर्वक वर्णन करते हैं / जिन देवताओं की आत्मा में नि…
- Verse 28मद से चूर दानव तो दानव शत्रु देवताओं के द्वारा नारायणरूपी गड्ढे में ऐसे गिराये गये हैं, ज…
- Verse 29गन्धर्व लोगों की तो बात ही जाने दीजिये । वे तो गानरूपी मद्यमें रात-दिन आसक्त (मरत) रहते ह…
- Verse 30विद्याधरो में ब्रह्मविद्या की योग्यता है, इसलिए वे विद्या के आधार कहे जाते हैं, यही कारण…
- Verse 31यक्षो की भी बात न्यारी है, वे मनुष्यों की निवासभूमिको क्षुब्ध किये हुए हैं, अपने को अविना…
- Verse 32जो राक्षस हैं , उनका तो शत्रुभूत विष्णु के द्वारा पूर्व में अनेक बार वेगपूर्वक विनाश किया…
- Verse 33पिशाच तो सदा भूख से ही तड़पते रहते हैं; उनको निरन्तर पेट भरने की विन्ता रहती हैं, अतः कभी…
- Verse 34उरी तह नायजाति में भी विवेक नहीं है, यह कहते हैं / यह पाताललोक में जो नागों का जालरूप विस…
- Verse 35कीटों के सदृश भूतल के छेद ही जिनके आवासस्थान हैं, उन असुररूपी बालकों के विवेक की तो कथा ह…
- Verse 36यों बल, वीर्य एवं प्रभाव आदि उत्तम गुणों से सम्पन्न देवों से लेकर असुर तक के लोगों को जब…
- Verse 37शराबियों के सदुश अतिव्यग्र सभी भूतजातियों के दिन निरर्थक लम्बी-लम्बी दुष्ट इच्छाओं या चेष…
- Verse 38जैसे अगाध जल में डूब रहे पुरुष का धूलि स्पर्श नहीं करती, वैसे विषयों में डूब रहे किसी पुर…
- Verse 39राघव, देह आदि में होनेवाले अभिमान एक प्रकार से प्रबल वायु ही हैं, इन वायुओं के झकोरों से…
- Verse 40जो योगिनियों का गण है, वह तामस भोगासक्तिरूप तालाब के दल-दल में जो कि सुरापान, रूधिरपान तथ…
- Verses 41–45यों देव आदि योनियें मे विकेक ज्ञान की दुर्लभता बतला कर अब उनमें जो प्रबुद्ध है, उनमें कुछ…
- Verse 46हे रघुकुल श्रेष्ठ, मनुष्यों में राजा, मुनि, उत्तम ब्राह्मण जीवन्मुक्त होते हैं, परन्तु ये…
- Verse 47स्री जातियों में जीवन्मुक्त हैं ही, परन्तु वे अति दुर्लभ हैं; यह जो कहा गया, उसका द्वष्टा…