Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 97, Verse 16
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 97, verse 16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 97 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
चितिश्चिन्तामणिरिव कल्पद्रुम इवेप्सितम् ।
आशु संपादयत्यन्तरात्मनात्मनि खात्मिका ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
सव वादियो को अपना अपना जो अभीष्ट बिद्धः हो जाता है उसमे प्रमाण कहते हैं /
आत्मचिति एक चिन्तामणि-सी है ओर कल्पवृक्ष-सी है, इसलिए वह आकाशवत् निर्मल होती
हुई भी अपने से ही अपने स्वरूप में जो भी अभीष्ट रहता है, उसे तत्काल ही सम्पादन करती
है