Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 97, Verse 13
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 97, verse 13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 97 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
एकः सर्वत्र कर्तेति सत्यं तन्मयचेतसाम् ।
सोऽयं निश्चयवान्सोऽत्र तदाप्नोतीत्यबाधितम् ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
पृथ्वी, अंकुर आदि सव कार्यों मे एक ही कर्ता है, यो कल्पना जो कोर्ड करते हैं; वह भी सत्य
है, क्योकि इस प्रकार के निश्वयवाले उपासको को एक कर्ता ईश्वर की प्राप्ति, उसकी अनुकम्पा,
वरदान आवि ग्राप्त होते देखे जाते हैं; यह कहते हैं /
अंकुर आदि सब कार्यो का एक ही कर्ता हे, इस प्रकार की कल्पना करनेवाले तन्मय
अन्तःकरणवाले वादियों का मत भी युक्त है, क्योंकि इस तरह एक कर्ता का निश्चय कर उपासना
करनेवाला अपने अन्तःकरण में तदुपास्य सर्वकर्ता एक परमात्मा को प्राप्त करता है । पूर्ववादी के
सदृश उसे बाधित नहीं मानता । अकालवृष्टि ओर अच्छे खेत में तृण आदि सबके लिए अनिष्ट
नहीं हैं और सब कर्मो के फलदाता ईश्वर दुष्कर्मफलरूप अनिष्टका भी यदि कर्ता हो जाय, तो कोई
दोष भी नहीं हो सकता