Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 97, Verse 12
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 97, verse 12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 97 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
स्वभावसिद्धमेवेदं युक्तमित्येव तद्विदाम् ।
अन्विष्टा याति नो प्राप्तिं बुद्धिमत्सर्वकर्तृता ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
यह जगत स्वभाव से
ही उत्पन्न होता है एवं नष्ट हो जाता है, जगत् का कोई भी कर्ता नहीं है, यों स्वभाववादियों का
जो मत है, वह भी युक्त ही है । इन स्वभाववादियों के मत में यह दलील है कि यद्यपि घट, पट
आदि स्थल मेँ बुद्धिमान् कर्ता हाथ लग सकता ही नहीं। असमय की वर्षा, उत्तम खेत में उत्पन्न
तृण आदि कर्ता के बिना स्वभाव से ही उत्पन्न होते रहते हैं जो धान पैदा करनेवाले किसानों के
अनिष्ट हैं, वे अपने कर्ता की कल्पना सह नहीं सकते, क्योंकि सबका अनिष्ट करनेवाला कोई
है नहीं ओर न उसे अकालवर्षा ओर पर खेत में तृण आदि के उत्पादन से प्रयोजन है, यह
कल्पना की जा सकती हे