Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 97, Verse 17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 97, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 97 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
नेदं शून्यं न चाशून्यमित्यवस्तु न तद्विदाम् ।
सर्वशक्तिर्हि सा शक्तिर्न तद्विद्यत एव तत् ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
यह जगत् न तो शून्य है ओर न अशून्य है, किन्तु अनिर्वचनीय है, इस प्रकार एक तृतीय
अनिर्वचनीय प्रकार को मानने वाले अनिवर्चनीयवादियों का मत भी सत्य ही है, क्योकि सर्वशक्तिरूप
ब्रह्म की जो माया शक्ति न तो शून्यरूप है ओर सत् (विद्यमान ब्रह्मरूपा) भी नहीं है, किन्तु
अनिर्वचनीय ही है