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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 97, Verse 36

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 97, verse 36 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 97 · श्लोक 36

संस्कृत श्लोक

अल्पमात्रकणार्थेन संचरन्ति दिवानिशम् । पिपीलिकासधर्माणः प्रायेण पुरुषा अपि ॥ ३६ ॥

हिन्दी अर्थ

यों बल, वीर्य एवं प्रभाव आदि उत्तम गुणों से सम्पन्न देवों से लेकर असुर तक के लोगों को जब विवेक दुर्लभ ह, तब दूसरों के लिए तो कहा ही क्या जाय, इस आशय से कहते हैं / जो पुरुष हैं वे भी तो प्रायः पिपीलिका के समानधर्मा ही है, क्योकि छोटे से कणों के लिए रात-दिन वे घूमा करते हैं