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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 97, Verse 11

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 97, verse 11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 97 · श्लोक 11

संस्कृत श्लोक

समाः सन्तश्च विप्राग्निविषामृतमृतिष्वपि । भान्त्येवं तद्विदां सर्वमिदं सर्वात्मकं यतः ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

जो सन्त पुरूष हैं वे तो ब्राह्मण, अग्नि, विष, अमृत, मरण, जन्म आदि सभी में जो कभी-कभी अत्यन्त विषमरूप धारण कर आते जाते रहते हैँ, निरन्तर समान भाव ही रखते हुए देखे जाते हैं, यह भी ठीक है, क्योकि जितनी भी वस्तु या सिद्धान्तस्थितिर्योँ है, वे सब यह अपरोक्ष आत्मरूप ब्रह्म ही है, इसलिए सभी वादियों को अपना-अपना अभिमत (इष्ट) सिद्ध हो जाता है