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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 97, Verse 47

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 97, verse 47 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 97 · श्लोक 47

संस्कृत श्लोक

भूतानि सन्ति सकलानि बहूनि दिक्षु बोधान्वितानि विरलानि भवन्ति किंतु । वृक्षा भवन्ति फलपल्लवजालयुक्ताः कल्पद्रुमास्तु विरलाः खलु संभवन्ति ॥ ४७ ॥

हिन्दी अर्थ

स्री जातियों में जीवन्मुक्त हैं ही, परन्तु वे अति दुर्लभ हैं; यह जो कहा गया, उसका द्वष्टान्त से समर्थन करते हैं अनेक तरह के असंख्य प्राणी चारों ओर दिशाओं में भरे पड़े हैं, किन्तु उनमें तत्त्वज्ञानसम्पन्न बहुत ही विरल होते हैँ । ठीक ही है, फलों, पल्लवो से युक्त वृक्ष होते तो असंख्य हैं, परन्तु उनमें कल्पवृक्ष विरले होते हैं