Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 97, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 97, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 97 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
संविन्मयत्वाज्जगतः स्वप्नस्य परमात्मनः ।
ब्रह्माकाशतया सर्वं ब्रह्मैवेत्यनुभूयते ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
ब्रह्म के सर्वशक्ति होने के कारण सक्षी वादियों की उक्ति सत्य है, इस कहे जाने काले अर्थ में
उपयोगी न तदस्ति“ इस पूर्व सर्गा की अन्तिम उक्त से प्रतिपादित तत्त्व का समर्थन करने के लिए
शृूमिका बॉबते हैं /
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : भद्र, परमात्मा का स्वप्नरूप जो यह जगत् है, वह चितिरूप तथा
ब्रह्मरूप आकाशात्मक है, अतः सब कुछ ब्रह्म ही है, इस स्थिति में सत्यरूप जगत् का ही सब
अनुभव करते हैं, इसलिए कुछ भी असत्य नहीं है, यह कहा गया
सर्ग सन्दर्भ
छियानबेवाँ सर्ग समाप्त सत्तानबेवाँ सर्ग ब्रह्म के सर्वशक्ति होने के कारण सर्ववादियो की उक्ति की सत्यता, सब लोगों की भोगों मेँ आसक्ति तथा तत््वज्ञानियोँ की विरलता का वर्णन।