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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 83

बयासीवाँ सर्ग समाप्त तिरासीवाँ सर्ग चिन्मात्र ही भैरवाकार वह भगवान्‌ शिव तथा भगवती काली हैँ, चिन्मात्र से अन्य वे नहीं हैं ।

29 verse-groups

  1. Verse 1बोध के लिए कल्पनादृष्टि से उस तरह भासित होते हैं, यह वर्णन । हे श्रीरामचन्द्रजी, एकमात्र…
  2. Verse 2हे पुण्यात्माओं में श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी, उसकी जो यह भयानक आकृति है वह वस्तुतः उसकी आक…
  3. Verse 3तत्त्वदृष्टि से मैने उस भयानक आकृति को उस समय शान्त चिदाकाशमात्र देखा | वस्तुतः अकेले मैं…
  4. Verse 4हे श्रीरामचन्द्रजी, वह कल्पान्त, वह रुद्र ओर वह भैरवी-ये सबके सब जिस तरह मायामात्र हैँ, य…
  5. Verse 5केवल वह निराकार चिदाकाश ही उस आकार विशेष से भैरवाकारता को प्राप्त दिखाई देता है । सच पूछि…
  6. Verse 6कल्पनादृष्टि से देखी गर वस्तु का वर्णन आपके सामने काच्य-काचककी यानी शब्द तथा अर्थ की सम्ब…
  7. Verse 7हे श्रीरामचन्द्रजी, चिरकाल के अभ्यास के कारण जगत्‌ में आपकी आधिभौतिक दृष्टि प्रौढ़ बन गई…
  8. Verse 8वस्तुतः न वह भैरवी है, न वह भैरव है और न वह प्रलयकाल ही है किन्तु वह समस्त ही भ्रान्तिमात…
  9. Verse 9स्वप्न में जिसका निर्माण हुआ है उस नगर की तरह, मनोरथ के युद्ध के वेग के समान, सुन लेना या…
  10. Verse 10जैसे स्वप्न-नगर भासता है, जैसे स्वच्छ आकाश में भौतिक बुद्धि होती है तथा जैसे आकाश में केश…
  11. Verse 11तब ग्रबोध होने पर केसे भारता है यह कहते हैं / प्रबोध होने पर एकमात्र स्वच्छ चिदाकाश ही अप…
  12. Verse 12जैसे चिदाकाश में स्वयं ही आत्मा स्फुरित होता है वैसे ही पट में स्फुरित होता है ओर उस कल्प…
  13. Verse 13हे श्रीरामचन्द्रजी, इस तरह मैंने भगवान्‌ भैरव तथा भैरवी के आकार का वर्णन किया, जो तत्त्वत…
  14. Verse 14जैसे भ्रान्ति से दिखाई दे रही शुक्ति आदि वस्तु अवस्तुभूत रजत आदि रूप के बिना किसी तरह टिक…
  15. Verse 15इसीलिए जैसे सुवर्ण कटक, केयूर आदि आकारों से सुशोभित होनेवाले अलंकाररूप से स्थित होता है व…
  16. Verse 16जो चेतन है, जिसमें चेतनत्व अवश्य स्वभावतः है, वह स्पन्दधर्मवाला होता ही है, क्योकि अधिष्ठ…
  17. Verse 17जो इस चिद्घन का स्पन्द है वही इस भगवान्‌ शिव का स्पन्द है । वही हम लोगों के सामने अपनी वा…
  18. Verse 18इसलिए हे श्रीरामचन्द्रजी, प्रलयकाल में वह भगवान्‌ शंकर भयंकर आकृतिवाले रुद्र होकर जो शीघ्…
  19. Verses 19–20श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : महर्षे, प्रामाणिक दृष्टि से वस्तुतः यह दृश्य है ही नहीं, इसलिए उ…
  20. Verses 21–22श्रीवसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामजी, ऐसी यदि आपकी शंका है, तो अपने द्वैत और एेक्य के सन्देहरू…
  21. Verse 23यदि प्रथम कल्य की विलक्षणता के लिए प्रलय में अविद्या आदि किसी वेत्यको आप स्वीकार करते हैं…
  22. Verse 24श्रान्ति के कारण अन्यथात्व का प्रतिभासत होनेपर भी वास्तविक स्वभाव की अग्रच्चुति में दष्टा…
  23. Verse 25इसलिए समस्त ज्ञेय को भली भाँति जानकर भी चिति अपने से अपने में सर्वदा ही ज्ञेय को शून्य जा…
  24. Verse 26एकमात्र यही कारण है कि उस छरष्टिकाल में भी प्रलय को अतीत एवं अनागत सभी तरह के हजारों प्रल…
  25. Verse 27कल्पना किया करता है
  26. Verse 28इसलिए हे श्रीरामचन्द्रजी, न तो द्वैत है, न ऐक्य है, न शून्यता है, न चेतन है ओर न अचेतन ही…
  27. Verse 29चिति के स्वयं चेत्यस्वरूप होने के कारण कहीं कोई कुछ भी नहीं चेतता यानी चिन्तन का विषय नही…
  28. Verse 30इस सम्पूर्ण वाङ्मय प्रपंच मेँ निर्विकल्प समाधि ही सिद्धान्त है ओर वह जीव की पाषाण के समान…
  29. Verse 31हे श्रीरामचन्द्रजी, आप भी परमेश्वर के समान लोकढृष्टि से अपने राज्य-परिचालन आदि आचारसमूहका…