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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 83, Verse 31

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 83, verse 31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 83 · श्लोक 31

संस्कृत श्लोक

कुर्वन्निजं प्रकृतमेव यथाप्रवाहमाचारजालमचलः परमार्थमौनात् । निर्मानमोहमदभेदमनङ्गजीवमाकाशकोशविशदाशयशान्तमास्व ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

हे श्रीरामचन्द्रजी, आप भी परमेश्वर के समान लोकढृष्टि से अपने राज्य-परिचालन आदि आचारसमूहका, पिता-पितामह आदि से जो क्रम चला आ रहा है उसी क्रमसे, परिचालन करते हुए अपनी दृष्टि से परमार्थतः मौन होने के कारण मान, मोह, मद आदि भेद से रहित अंगों तथा उनके अभिमानी जीव से रहित हो आकाशकोश के समान विशालहृदय हो शान्त स्थित रहिये