Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 83, Verses 21–22
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 83, verses 21–22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 83 · श्लोक 21, 22
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
एतदेव तदाप्यङ्ग द्वैतैक्याम्भोधिशान्तये ।
यदि चिन्मात्रनभसश्चेत्यमस्ति न किंचन ॥ २१ ॥
न किंचिच्चेतति ततः क्वचित्किंचित्कदाचन ।
सर्वं शान्तं दृषन्मौनं विज्ञानघनमम्बरम् ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामजी, ऐसी यदि आपकी शंका है, तो अपने द्वैत और एेक्य के
सन्देहरूपी सागर की शान्ति के लिए यह उत्तर सुनिये-सबका प्रलय होनेपर परिशिष्ट चिन्मात्र
आकाश का यदि कुछ भी चेत्य नहीं है, तो फिर उससे अतिरिक्त किसी दूसरी वस्तु नहीं चेतता,
क्योकियत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाऽभूत् तत्केन कं पश्येत्" जहाँ सब इसका आत्मा ही हो गया, वहाँ
कौन किससे किसको देखेगा ? यानी उस दशा में द्रष्टा, दृश्य, दर्शन, चेतयिता, चेत्य, चितिक्रिया
का संभव नहीं है । (ऐसी दशा में प्रामाणिक दृष्टि से सिद्ध नित्यमुक्तः आत्मस्वभाव ही प्रलय है -
यह आपने प्रिद्ध करदिया, अतः सवक तरह से आपका प्रथम कल्य ही सम्पन्न हआ ऐसा कहते हैं /
अतः सब शान्त पाषाणवत् मोन विज्ञानघन आकाश ही सर्वदा स्थित हैं / ऐसी दशा में; अप्रामाणिक
द्रष्टि से द्वितीय विकल्यका आश्रय करके आपका प्रश्न करना ठीक नहीं है. यह भाव ह ८)