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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 83, Verse 28

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 83, verse 28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 83 · श्लोक 28

संस्कृत श्लोक

तस्मान्न द्वैतमस्तीह न चैक्यं न च शून्यता । न चेतनाचेतनं वै मौनमेव न तच्च वा ॥ २८ ॥

हिन्दी अर्थ

इसलिए हे श्रीरामचन्द्रजी, न तो द्वैत है, न ऐक्य है, न शून्यता है, न चेतन है ओर न अचेतन ही है, किन्तु एकमात्र निश्चित मौन ही है अथवा वह (मौन) भी नहीं है, किन्तु चिन्मात्र ही स्थित है । कहने का तात्पर्य यह है कि सृष्टि और प्रलय में जो विशेष है वह अपने अनुभव से ही सिद्ध है, एक साथ प्रतीति होने से इसका कोई अपलाप नहीं कर सकता