Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 83, Verse 23
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 83, verse 23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 83 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
यच्चेदं चेत्यते नाम तत्स्वभावोऽस्य वल्गति ।
चित्स्वभावस्य शान्तस्य स्वसत्तायामवस्थितेः ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि प्रथम कल्य की विलक्षणता के लिए प्रलय में अविद्या आदि किसी वेत्यको आप स्वीकार
करते हैं; तो फ़िर उम्नी से त्रिपुटी, जयत्घाटित रुद्र और देवी का शरीर तथा उनका नृत्य भी सब
उक्त दशा में रह सकते हैं; इसलिए मैने जो कुछ कहा हे वह कुछ भी अरस्रंधावित नहीं है- ग़्बकी उस
दशा में संभावना की जा सकती है, इस आशय से कहते हैं /
और जो कुछ यह चेतित होता है वह इस ब्रह्म का अविज्ञात आत्मरूप ही प्रलय में भी
रुद्र, देवी ओर उसके नृत्यरूप से प्रथित होता है । (इतने से ब्रह्म के वास्तव कूटस्थ चित्स्वरूप
में किसी तरह की हानि होती हो, सो भी नहीं है-आप भूलकर भी इसके वास्तविक स्वरूप
की हानि की आशंका न कीजियेगा,) क्योंकि चित्स्वभाव शान्तस्वरूप इस ब्रह्म की अपनी सत्ता
में ही अवस्थिति रहती हे