Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 83, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 83, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 83 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
चिन्मात्रपरमाकाश एष यः कथितो मया ।
एषोऽसौ शिव इत्युक्तस्तदा रुद्रः प्रनृत्यति ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
बोध के लिए कल्पनादृष्टि से उस तरह भासित होते हैं, यह वर्णन ।
हे श्रीरामचन्द्रजी, एकमात्र यही कारण है कि आपकी अविद्या-श्रान्ति के निरास द्वारा तात्विक
(=) देखिये यह श्रुति : "इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान् एकं सद्विप्रा
बहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः ।“
शिवस्वरूप दृष्टि के उद्घाटन के लिए मेने जयत्-ग्रलय के समय रुद्र-नृत्य आदि का, जो
स्वानुभूत हैं; वर्णन किया हैं, वही परमार्थ है, ऐसे आपको श्रम नहीं कर लेना चाहिए, यह कहते हैं /
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, यह जो मैंने आपसे वर्णन किया है वह चिन्मात्र
परमाकाश ही है, यही शिवरूप से कहा गया है । यही प्रलयकाल में रुद्र होकर नृत्य करता है
सर्ग सन्दर्भ
बयासीवाँ सर्ग समाप्त तिरासीवाँ सर्ग चिन्मात्र ही भैरवाकार वह भगवान् शिव तथा भगवती काली हैँ, चिन्मात्र से अन्य वे नहीं हैं ।