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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 83, Verses 19–20

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 83, verses 19–20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 83 · श्लोक 19,20

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । प्रामाणिकदृशा दृश्यमिदं नास्त्येव वस्तुतः । यदेवास्तीव तत्सर्वं कल्पान्ते प्रविनश्यति ॥ १९ ॥ तत्कल्पान्तमहाशून्ये एतस्मिन्परमाम्बरे । कथं चिन्नाम वाऽचेत्यं चेता चेतति चिद्धनः ॥ २० ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : महर्षे, प्रामाणिक दृष्टि से वस्तुतः यह दृश्य है ही नहीं, इसलिए उस कल्प में आपसे मेरा कुछ प्रश्न नहीं है, किन्तु अप्रामाणिक दृष्टि पक्ष में आपसे पूछता हूँ कि जो कुछ एक तरह से सत्तावान्‌-सा है वह सब कल्पान्त में नष्ट हो जाता है, तो फिर कल्पान्त में महाशून्य उस परमाकाश में चेत्यरहित चिति कैसे रहती है तथा आश्रय के अभाव में चेतयिता कैसे रहती है अथवा स्वातिरिक्त चितिक्रिया के अभाव में चिद्घन कैसे चेतता है ? कहने का तात्पर्य यह है कि उस दशा में त्रिपुटी का रहना किसी तरह नहीं बन सकता । यदि आप यह कहें कि उस समय न रहते हुए भी दृश्य को अविद्या दिखला देती है, इसलिए उसीसे त्रिपुटी की सिद्धि हो सकती है, तो इस पर मेरा सविनय यह निवेदन है कि सर्ग और प्रलय में विशेषता ही क्या रही ? क्योकि अचेतित-चितिक्रियाशून्य सर्वजगद्घटित रुद्र और देवी के शरीर में उस नृत्य की किसी तरह संभावना नहीं की जा सकती । भाव यह कि एक समय में द्वैत ओर एेक्य की भावना कदापि नहीं हो सकती