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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 63

बासठवाँ सर्ग समाप्त तिरसठवों सर्ग अज्ञानी की दृष्टि मेँ भीतर ही भीतर अनन्त सर्गसम्पत्तियाँ हैं, लेकिन ब्रह्मज्ञानी की दृष्टि में एकमात्र चिद्घन ब्रह्म ही सब कुछ है, यह वर्णन।

29 verse-groups

  1. Verse 1स्वप्न व्यवहार का द्ष्टान्त देकर पूर्व में समर्थित हुए भी शरीररहित पुरुष के सभाक्ण आदि रू…
  2. Verse 2वर्णो का जो उच्चारण आदि व्यवहार है उसमें शरीर की कारणता नहीं है, क्योकि मृतक के शरीर के र…
  3. Verse 3उक्त अर्थ में अनुकूल तथा विपक्ष में प्रतिकूल तर्क उपस्थित करते हैं / यदि कहीं स्वप्नों मे…
  4. Verse 4इसलिए स्वप्न में उसकी सत्यता कुछ भी नहीं है, वह एकमात्र भ्रांति ही हैं। निद्रास्वभाव बल स…
  5. Verse 5जैसे नेत्ररोग के कारण चन्द्रमा में कालापन, आकाश में साकारता, पत्थर की मूर्ति आदिमें गीत आ…
  6. Verse 6जैसे आकाश का मूर्तरूप से स्फुरण आकाश से भिन्न नहीं है, वैसे ही वह चिदाकाश का स्फुरण आदि भ…
  7. Verse 7इस्र तरह स्वप्न के पदार्थों में चिदाकाशमात्रता सिद्ध करके उसी के साम्य से स्रायने स्थित त…
  8. Verse 8इससे प्रिद्ध हुआ कि जो कुछ दीखता हे वह सव विति का ही स्फुरणरूप चमत्कार है, अणुमात्र भी अव…
  9. Verse 9प्रमाणमस्य जयव्प्रपंच की तुलना प्रमाणयम्य स्वप्न से करना अयुक्त हैं, यह श्री रामचन्द्रणी…
  10. Verse 10ठीक है आपाततः यह भरले ही आँखों का विषय हो जाय, फिर भी तत्वतः विमर्श को सहन न कर सकने से त…
  11. Verse 11इस तरह परस्पर एक दुसरे का बीज होने से तथा विरुद्ध भेद ओर अभेदरूप एवं सम ओर असमरूप होने से…
  12. Verse 12केले की छाल की रचना की तरह परस्पर भीतर-ही- भीतर अनन्तरूप में इनकी स्थिति का अनुभव होने से…
  13. Verse 13उसीका पुनः उपपादन करते हैं / वे सब जगत्‌ परस्पर एक दुसरे को कदापि कुछ नहीं देख पाते तथा क…
  14. Verse 14नष्ट हो जाने पर भी वे चेतनरूप ही रहते हैं, तपे हुए खप्पर (भिक्षापात्र) में गिरे हुए जलबिन…
  15. Verses 15–16सोये हुए वे जीव स्वप्नजंजाल को प्राप्त कर वहीं पर कल्पित दिनों में अपना सब व्यवहार करते ह…
  16. Verse 17इसी तरह मनुष्य भी अपने स्वप्नरूप जगत्‌-समूह में वासनाओं के कारण अपना-अपना आचार और व्यवहार…
  17. Verse 18चूँकि वे भी ज्ञान न होने के कारण मोक्षरहित और शरीरशन्य ही रहते हैं, इसलिए वे जाग्रत में स…
  18. Verse 19यह अद्र और मनुष्यों में जो दिखलाया गया न्याय हैं, उसे राक्षत आदि में लगाना चाहिए, इस आशय…
  19. Verse 20हे श्रीरामचन्द्रजी, इस तरह जो स्वप्न में मारे गये कहिये वे क्या करते हैं । अज्ञान के कारण…
  20. Verse 21पर्वत, सागर, पृथ्वी तथा अनेक जनों से भरे यथास्थित इस सम्पूर्णं दृश्य प्रपंच को वे लोग चिर…
  21. Verse 22हे श्रीरामचन्द्रजी, उनके कल्प ओर जगत्‌ की स्थिति, जैसी हम लोगों की है वैसी ही है और हम लो…
  22. Verse 23ऐसी स्थिति में हम लोगों से अनुभूत हो रहा यह जगत्‌ तथा इसके भीतर रहनेवाले हम लोग यदि उनसे…
  23. Verse 24हे श्रीरामचन्द्रजी, उनके स्वप्न के वे पुरुष अपने तथा अन्य पुरुष के अनुभव से चूँकि तुल्य ह…
  24. Verse 25जैसे आत्मा में वे स्वप्न के पुरुष सत्य हैं वैसे ही दूसरे भी पुरुष, जिनका प्रत्येक स्वप्न…
  25. Verse 26जैसे आपने उस अपने स्वप्न में अनेक नगर तथा अनेक नागरिक देखे, वैसे ही वे सब अब भी स्थित हैं…
  26. Verses 27–32तत्‌-तत्‌ स्वाप्निक पदार्थ जाग्रत्‌अवस्था में विशीर्ण हो जाते हैं, यह जैसे अनुभव होता है,…
  27. Verse 33उतनी सख्या से भी संसार की संख्या समाप्त नहीं हो जाती, इसलिए अनवस्था बराबर बनी हुई है, जो…
  28. Verse 34इस तरह आदि और अन्त से शून्य यह दृश्यमान भ्रम बराबर चला ही जा रहा है। इसका कहीं पर ओर-छोर…
  29. Verse 35हे श्रीरामचन्द्रजी, भीतर में, आकाश में, पाषाण में, जल में और स्थल में सर्वत्र तत्‌-तत्‌ प…