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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 63, Verse 10

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 63, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 63 · श्लोक 10

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । शृणु स्वप्नमयान्येव कथं सन्ति जगन्त्यलम् । नान्यानि न च सत्यानि न स्थिराणि स्थितानि च ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

ठीक है आपाततः यह भरले ही आँखों का विषय हो जाय, फिर भी तत्वतः विमर्श को सहन न कर सकने से तथा अस्थिर होने से स्वप्न का सराग्य है ही, इस आशय से कहते हैं / महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, यह जगत्‌ कैसे स्वप्न ही है, यह आप अच्छी तरह सुनिये। स्वप्न के समान ही ये जगत न तो आत्मा से भिन्नरूप है और न तो आत्मा के समान ये सत्यरूप और स्थिर ही है । ये सब के सब अनिर्वचनीय ही एकमात्र आत्मसत्ता से स्थित है