Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 63, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 63, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 63 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
तव स्त्रियाऽस्वरूपेण देहेनाभूत्तया कथम् ।
कथमुच्चारितास्तत्र वर्णाः कचटतादयः ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
स्वप्न व्यवहार का द्ष्टान्त देकर पूर्व में समर्थित हुए भी शरीररहित पुरुष के सभाक्ण आदि
रूप व्यवहार को मन्वबुद्धि पुरुषों के स्पष्ट बोध के लिए श्रीरामचन्द्रजी पूछते हैं /
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : 'हे मुने, उस स्त्री के साथ मुख, जीभ आदि अवयवों से रहित एकमात्र
वासनारूप देह से आपका संभाषण आदि व्यवहार कैसे हुआ ? उस दशा में आपने कच ट त प
आदि वर्णों का जीभ के बिना कैसे उच्चारण किया ?
सर्ग सन्दर्भ
बासठवाँ सर्ग समाप्त तिरसठवों सर्ग अज्ञानी की दृष्टि मेँ भीतर ही भीतर अनन्त सर्गसम्पत्तियाँ हैं, लेकिन ब्रह्मज्ञानी की दृष्टि में एकमात्र चिद्घन ब्रह्म ही सब कुछ है, यह वर्णन।