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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 63, Verses 27–32

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 63, verses 27–32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 63 · श्लोक 27-32

संस्कृत श्लोक

प्रबोधेऽपि हि भिद्यन्ते स्वप्नभावा यथा स्थिताः । तथा स्थित्यानुभूयन्ते परब्रह्मतयाथवा ॥ २७ ॥ सर्वं सर्वात्म सर्वत्र सर्वदास्ति तथा परे । यथा न किंचिन्नाकाशे न क्वचिन्न च हन्यते ॥ २८ ॥ निरन्तरे पराकाशे निरन्ते च विनोदये । निरन्ते चित्तसंघाते निरन्ते जगतां गणे ॥ २९ ॥ प्रत्याकाशकलाकोशं प्रतिसंसारमण्डलम् । प्रतिलोकान्तराकारं प्रतिद्वीपं गिरिं प्रति ॥ ३० ॥ प्रतिमण्डलविस्तारं प्रतिग्रामं पुरं प्रति । प्रतिजन्तु प्रतिगृहं प्रतिवर्षं युगं प्रति ॥ ३१ ॥ यावन्तो ये मृताः केचिज्जीवा मोक्षविवर्जिताः । स्थितास्ते तत्र तावन्तः संसाराः पृथगक्षयाः ॥ ३२ ॥

हिन्दी अर्थ

तत्‌-तत्‌ स्वाप्निक पदार्थ जाग्रत्‌अवस्था में विशीर्ण हो जाते हैं, यह जैसे अनुभव होता है, वैसे ही वे स्वप्नकाल में स्थित भी रहते हैं, यह भी अनुभव होता है। अथवा सबकी सत्ता ब्रह्मसत्तारूप हे, इसलिए किसी की सत्ता का कदापि अपलाप नहीं किया जा सकता अतः सर्वात्मक सभी सर्वत्र सदा परब्रह्म परमात्मा में ही है आकाशरूप से स्थित इसका कुछ भी कहीं नाश नहीं होता, वैसे ही उत्पत्तिशून्य, निरन्तर और अनन्त परमाकाश ब्रह्म में अन्तशून्य-अनेक चित्तसमूह हैं, उनमें अन्तशून्य (असीम) अनेक जगत्‌ के गण हैं, उनमें भी प्रत्येक संसार के अनेक आकाश कला कोश हैं, उनमें भी प्रत्येक के अनेक संसार मण्डल हैं, उनमें भी प्रत्येक संसार मंडल के पृथिवी आदि भिन्न-भिन्न आकार के अनेक लोक हैं, उन लोकों के अन्दर अनेक द्वीप हैं, उनमें भी प्रत्येक द्वीप के भीतर अनेक पर्वत है, उन पर्वतो में भी प्रत्येक पर्वत में अनेक मण्डलो का विस्तार है, उनमें भी प्रत्येक मण्डल के अनेक ग्राम हैं, उनमें भी प्रत्येक गाँव के अन्दर अनेक छोटे-छोटे गाँव हें, उन छोटे-छोटे गाँवों के भीतर अनेक घर हैं, उनके भी प्रत्येक घर के अन्दर अनेक प्राणी रहते हैं उन सब प्राणियों के बीच अनेक युगादिकाल हैं । जितने जो जीव मर चुके हैं और जो मोक्षरहित स्थित हैं उतने ही उनके अनेक अक्षय संसार पृथक्‌-पृथक्‌ स्थित हें