Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 63, Verse 35
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 63, verse 35 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 63 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
कुड्ये नभस्युपलके सलिले स्थलेऽन्त श्चिन्मात्रमस्ति हि यतस्तदशेषविश्वम् ।
तद्यत्र तत्र जगदस्ति कुतोऽत्र संख्या तज्ज्ञेषु तत्परमथाज्ञमनःसु दृश्यम् ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामचन्द्रजी, भीतर में,
आकाश में, पाषाण में, जल में और स्थल में सर्वत्र तत्-तत् पदार्थों के अन्दर चूँकि चिन्मात्र
परमात्मा ही विराजमान है, अतः वही सम्पूर्ण विश्वरूप स्थित है, "जगत" इस नामकी कोई
दूसरी वस्तु है नहीं । ऐसी स्थिति में चिन्मात्र परमात्मा के सर्वव्यापी होने से जहाँ-तहाँ सर्वत्र
जगत् है वह सारा विश्व तत्त्वज्ञानियों की दृष्टि में निर्विशेष निरतिशयआनन्दैकरस ब्रह्म ही है,
परन्तु वही विश्व अज्ञानियों के मन में दृश्यप्रपंचरूप से स्थित है यानी अनर्थरूप ही है