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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 63, Verse 2

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 63, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 63 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । वर्णेषु खशरीराणां वर्णाः कचटतादयः । कदाचनापि नोद्यन्ति शवानामिव केन च ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

वर्णो का जो उच्चारण आदि व्यवहार है उसमें शरीर की कारणता नहीं है, क्योकि मृतक के शरीर के रहते हुए भी कैला व्यवहार नहीं दीखता तथा शरीर के न रहनेपर भी स्वप्न में उस तरह का अनेक व्यवहार दीखता है, अतः अन्वयव्यतिरेकव्यभिवार है तथा व्यवहार को सहेतुक मानने पर सत्यतायक्ति भी हैं / इसलिए जो कुछ व्यवहार ह वह कव प्रिर्फ कल्पनामात्र हैं उस तरह का व्यवहार तो उस समय भी दुर्लभ ही था, इस आशय से महाराज वस्तिष्ठजी उत्तर देते हैं / महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, चिदाकाशरूप तत्वज्ञानियों के मत में वर्णो के बीच में जो कच ट त प आदि वर्ण हैं उनके किसी काल में भी उच्चारण ऐसे नहीं होते, जैसे मृतकों के मुख से किसी वर्ण के उच्चारण नहीं होते, क्योंकि वे सभी कल्पनामात्ररूप ही हैं