Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 63, Verse 11
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 63, verse 11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 63 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
अनुभूतानि बीजानि बीजराशाविवाम्वरे ।
अन्यान्यन्यानि तान्येव समानि न समानि च ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
इस तरह परस्पर एक दुसरे का बीज होने से तथा विरुद्ध भेद ओर अभेदरूप एवं सम ओर
असमरूप होने से इनका स्वप्नसाम्य है ही, यह कहते हैं /
जैसे बीज की राशि में अनुभूत हुए बीज स्वप्न में कोई अन्य-अन्य होते हैं कोई ठीक वे ही
उत्पन्न होते हैं, कोई सम होते हैं और कोई विषम भी होते हैं | वैसे ही चिदाकाश में सब जगत् कोई
विषम भी होते है