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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 63, Verse 7

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 63, verse 7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 63 · श्लोक 7

संस्कृत श्लोक

यथा स्वप्नस्तथैवेदं जाग्रदग्रे व्यवस्थितम् । आकाशमप्यनाकाशं यथैवेदं तथैव तत् ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

इस्र तरह स्वप्न के पदार्थों में चिदाकाशमात्रता सिद्ध करके उसी के साम्य से स्रायने स्थित तथा समाधि में दृष्ट पदार्थों में भी विदाकाशमात्रता सिद्ध ही है, यह कहते हैं । जैसे स्वप्नकालका जगत्‌ चिदाकाशरूप है, वैसे ही हम लोगों के सामने स्थित यह जाग्रत्‌ काल का जगत्‌ भी चिदाकाशरूप व्यवस्थित है । तथा जैसे यह जगत्‌ चिदाकाशरूप होते हुए भी चिदाकाशरूप नहीं है, वैसे ही समाधिकाल का भी मेरा वह जगत्‌ है