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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 63, Verse 8

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 63, verse 8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 63 · श्लोक 8

संस्कृत श्लोक

यथा कचति तच्चारु चेतनं चतुरं तथा । यथा स्थितं तदेवेदं सत्यं स्थिरमिव स्फुरत् ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

इससे प्रिद्ध हुआ कि जो कुछ दीखता हे वह सव विति का ही स्फुरणरूप चमत्कार है, अणुमात्र भी अविद्य कुछ नहीं है, यह कहते हैं । जिस रीति से यह सब सौन्दर्यपूर्ण जगत्‌ स्फुरित हो रहा है उस रीति से तो वह चतुर ब्रह्म ही स्फुरित हो रहा है । जैसा यह जगत्‌ सत्य और स्थिर-सा स्फुरित हो रहा है वैसा तो वह चतुर ब्रह्म ही स्थित है