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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 63, Verses 15–16

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 63, verses 15–16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 63 · श्लोक 15,16

संस्कृत श्लोक

सुप्ताः स्वप्नजगज्जालमहनि व्यवहारिणः । असुरा निहता देवैस्ते स्वप्नजगति स्थिताः ॥ १५ ॥ अज्ञानान्न गता मुक्तिं न जाड्याज्जडतामिताः । न देहवन्तः किं सन्तु विना स्वप्नजगत्स्थितेः ॥ १६ ॥

हिन्दी अर्थ

सोये हुए वे जीव स्वप्नजंजाल को प्राप्त कर वहीं पर कल्पित दिनों में अपना सब व्यवहार करते हैं। स्वप्न-जगत में स्थित वे असुर देवताओं से निहत होकर अपने अज्ञान के कारण न तो मुक्ति प्राप्त करते हैं, न जड़ता के कारण जड़भाव को प्राप्त होते हैं और न देहसहित ही वे रहते हैं । ऐसी दशा में इस तरह के वे स्वप्नजगत्स्थिति के सिवा हो ही क्या सकते हैं ?