Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 58
सत्तावनवाँ सर्ग समाप्त अड्डावनवाँ सर्ग सम्पूर्ण सृष्टि की शोभा सभी जगह है और नहीं भी है, इस प्रकार का जो पाषाणाख्यायिका का अर्थ है, उसका दृष्टि भेद से वर्णन।
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- Verse 1प्रासंगिक जो जीवन्मुक्त पुरुष के अहंकार की अबाधकता थी, उसका समर्थन किया ग्या, अव प्रक्रत…
- Verse 2भगवन्, सब कुछ सब जगह सभी प्रकार से सत् है और सब कुछ सब जगह सदा ही सत् है-यह जो विषय प्…
- Verse 3ब्रह्मन्, अब इस विषय में मुझे जो यह सन्देह है, इसका निवारण कीजिए । भगवन्, यह पाषाणाख्या…
- Verse 4महाराज वसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामजी, “सब कुछ सर्वदा सभी जगह है", यह जो प्रतिपादन करना है,…
- Verse 5या सव धर्मो का सकर कहना हैं, किन्तु पाणण-उदर के अध्यास का अधिष्ठानश्रूत जो ब्रह्म है, उस्…
- Verse 6अथवा थावपवार्थों के उदराधिष्ठानभरूत चेतन में जिस तरह हजारे सष्टियों का सम्भव हैं, उसी तरह…
- Verse 7इस न्याय की सर्वत्र योजना करनी चाहिए, इस आशय से कहते हैं / गुल्म, अंकुर आदि तथा प्राण, वा…
- Verse 8श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे मुने, दीवार, पाषाण आदि के उदर चेतन में अनेक सर्गो का आरोप है,…
- Verse 9ठीक हैं, आपने जिर पक्ष का शंका में उल्लेख किया है, ठीक यही पक्ष युख्यरूप से मुझे भी अभिप्…
- Verse 10यों जब ब्रह्मगात्रता ही है, तब दृश्य की अनुत्पत्ति ही फलित हुई. यह कहते हैं / श्रीरामभद्र…
- Verse 11आरोयद्रष्टि से शर्वो के प्रत्येक परमाणु में सबका आरोप कर सव कुछ देखा जा सकता हैं और अपवाव…
- Verse 12ऐसा तेज का कोई भी अणु नहीं है, जिसमें सर्गों की स्थिति न हो और वास्तव में तो कहीं पर भी स…
- Verse 13ऐसा वायु का कोई भी परमाणु नहीं है,जो सर्गो सो भरा न हो और वे सर्ग भी वास्तव में नहीं हैं,…
- Verse 14अणुमात्र भी आकाश सृष्टियों से रहित हो, ऐसा नहीं है, किन्तु सब सृष्टियों से परिपूर्ण है और…
- Verse 15ऐसे मिले हुए पंचमहाभूत भी नहीं हैं, जो सर्गाँ से परिपूर्ण न हों, किन्तु सर्गाँ से परिपूर्…
- Verse 16पर्वतों का भी ऐसा कोई अणु नहीं है, जो सर्गाँ से भरा पड़ा न हो, किन्तु सभी परमाणु सर्गो से…
- Verse 17सूक्ष्मभूतरूप उपाधि से युक्त हिरण्यगर्भ का भी ऐसा कोई अणु नहीं है, जो सृष्टियों से भरा हु…
- Verse 18हिरण्यगर्भ के निर्मित संसारों में ऐसा कोई सूक्ष्मातिसूक्ष्म भाग नहीं हैं, जो सदा ब्रह्मरू…
- Verse 19जैसे अग्नि एवं सूर्य की उष्णता में कोई परस्पर भेद नहीं है, किन्तु उष्णता और अग्नि या सूर्…
- Verse 20भद्र, ये सर्ग और ब्रह्म आदि जो शब्द हैं, उनके विषय में यदि विचारा जाय, तो अर्थ से शून्य ह…
- Verse 21फरमार्थदशा में सर्ग ओर ब्रह्म आदि थब्दार्थों का भेद भले ही न हो, क्योकि उस्र दशा में द्वै…
- Verse 22अतएव तत्त्ववेत्ताओं के लिए व्यवह्मरकाल में भी वह कैसा ही रहा हे यह कहते हैं । हे प्रिय श्…
- Verse 23वर्णित पाषाणाख्यायिका का जो तात्पर्य है, उसका उपसंहार करते हैं / हे श्रीरामजी, यह समस्त द…