Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 58, Verse 5
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 58, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 58 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
नीरन्ध्रैकघनाङ्गस्य पाषाणस्यापि कोटरे ।
सन्ति सर्गसहस्राणि कथयेति प्रदर्श्यते ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
या सव धर्मो का सकर कहना हैं, किन्तु पाणण-उदर के अध्यास का अधिष्ठानश्रूत जो ब्रह्म
है, उस्म असकीर्णरूप से सब जगत् का अध्यास हो सकता है यों संभावना बतलाने के लिए
उक्त दृष्टान्त का उपन्यास है, यह कहते हैं /
छिद्रों से रहित, अत्यन्त घनीभूत अवयवोंवाले पाषाणोदर में (पाषाणोदराध्यास के अधिष्ठान
चेतन में) भी हजारों सृष्टया हैं, यह प्रस्तुत पाषाणाख्यान के द्वारा बतलाया गया है